विकसित भारत की सोच का केंद्र समावेशी और समान शिक्षा : धर्मेंद्र प्रधान
नई
दिल्ली, । केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने
बुधवार को कहा कि समावेशी और समान शिक्षा ही विकसित भारत की परिकल्पना का
मूल आधार है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘सबका साथ, सबका
विकास, सबका विश्वास’ के विजन का उल्लेख करते हुए कहा कि हर बच्चे को
गरिमा, समान अवसर और आत्मनिर्भर भविष्य सुनिश्चित करना सरकार और समाज की
सामूहिक जिम्मेदारी है।
प्रधान ने यहां शिक्षा मंत्रालय के स्कूल
शिक्षा एवं साक्षरता विभाग द्वारा आयोजित तीन दिवसीय समावेशी शिक्षा शिखर
सम्मेलन–2026 के उद्घाटन के अवसर पर यह विचार व्यक्त किए। इस मौके पर
उन्होंने विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए नवीनतम तकनीक आधारित सहायक
उपकरणों की प्रदर्शनी का भी उद्घाटन किया।
अपने संबोधन में केंद्रीय
मंत्री ने कहा कि समावेशी शिक्षा किसी एक योजना तक सीमित नहीं बल्कि यह
राष्ट्रीय प्रतिबद्धता का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि दिव्यांगता की
श्रेणियों को छह से बढ़ाकर 21 करना इसी समावेशी दृष्टिकोण को दर्शाता है।
उन्होंने डिस्लेक्सिया और डिस्कैल्कुलिया जैसी सीखने से जुड़ी चुनौतियों की
शुरुआती पहचान पर बल देते हुए कहा कि समावेशी शिक्षा केवल स्कूल या परिवार
की नहीं बल्कि पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है।
प्रधान ने
प्रदर्शनी का अवलोकन करते हुए भारतीय स्टार्ट-अप्स द्वारा विकसित
विश्वस्तरीय सहायक तकनीकों की सराहना की। उन्होंने कहा कि दिव्यांगजनों के
लिए गरिमा, सुगमता और समान अवसर सुनिश्चित करना सामूहिक प्रयासों से ही
संभव है, जिसके लिए सक्षम कानून, सुलभ अवसंरचना, समावेशी नीतियां और सतत
नवाचार आवश्यक हैं।
इस अवसर पर स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के
सचिव संजय कुमार ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 का लक्ष्य ऐसा
समावेशी शिक्षा तंत्र बनाना है, जिसमें कोई भी बच्चा स्कूल से बाहर न रहे
और वर्ष 2030 तक माध्यमिक स्तर पर शत-प्रतिशत सकल नामांकन हासिल किया जा
सके।
शिखर सम्मेलन का उद्देश्य एनईपी–2020 और दिव्यांगजन अधिकार
अधिनियम–2016 के अनुरूप विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए नीतियों,
व्यवहारों और नवाचारों को मजबूत करना है। तीन दिवसीय इस सम्मेलन में नीति
निर्माताओं, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों, राष्ट्रीय संस्थानों,
शिक्षा बोर्डों, विशेषज्ञों, स्टार्ट-अप्स और उद्योग जगत के प्रतिनिधि भाग
ले रहे हैं, ताकि समावेशी शिक्षा के लिए भविष्य की दिशा तय की जा सके।

